लोकतंत्र का हत्यारा है “व्हिप” का काला कानून | Yogesh

यह देश की पुनः गुलामी का कारण बनेगा !!

राजीव गांधी ने 1985 में इसा काला कानून बनाया कि हमारे लोकतंत्र का प्रत्याशी हमेशा-हमेशा के लिए पोलिटिकल पार्टियों की गुलामी करने के लिये मजबूर हो गया !

सन 1600 में ब्रिटेन से एक कंपनी निकली थी ! जिसने भारत को गुलाम कर लूट मचाने के लिए अपनी सरकार बना ली थी और ब्रिटिश सरकार के सहयोग से काले कानूनों के सहारे हमे खोखला कर के चले गये ! जिसे हम ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से जानते हैं ! आज फिर से वही कंपनियां भारत में आकर व्यापर शुरू कर रही हैं ! जिनको भारत सरकार पैन कार्ड देती तो है लेकिन एक चवन्नी भी टैक्स नहीं कर सकती है !

यह वह प्राइवेट कंपनियां हैं, इन पर सूचना का अधिकार कानून तक लागू नहीं होता है ! ये चुनाव लड़वाती हैं ! अपने राजनैतिक एजेंट सत्ता में सेट करती हैं ! जो हमारे भाग्य विधाता बनकर उनके हित में कानून बनाते हैं और डंडे के जोर पर हमसे पालन करवाते हैं ! लेकिन दरअसल हमारे द्वारा निर्वाचित वह जनप्रतिनिधि इन प्राइवेट कंपनियों के गुलाम या एजेंट से अधिक कुछ नहीं हैं ! ये प्रायोजित लूट हमारे लोकतंत्र के लिये खतरा है !

वास्तव में लोकतंत्र तो उसी दिन समाप्त हो गया था,, जिस दिन “व्हिप के काले कानून” को संसद में मान्यता दे दी गई थी ! यह वह हंटर कानून है जिससे जनप्रतिनिधियों को राजनैतिक दल नियंत्रित रखते हैं और एक नहीं सभी राजनैतिक दल कांग्रेस, बीजेपी, एसपी, बीएसपी आदि आदि अपनी तानाशाही के लिये इस व्हिप के इस काले कानून का सहारा लेती हैं ! जिससे विदेशी कंपनियों को लाभ होता हो और इससे इन राजनैतिक दलों को आर्थिक लाभ होता है जिससे यह दल महंगे चुनाव लड़ पाते हैं !

हम आजाद तो हुए लेकिन इन राजनैतिक पार्टियों ने हमें फिर से गुलाम बना डाला और उससे भी दुख की बात यह है कि हमें इस गुलामी का एहसास तक नहीं है ! हम हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त मनाकर यह समझ लेते हैं कि हम आजाद हैं !

पर आज भी हमारे ऊपर विदेशी कम्पनियाँ हमारे ही जनप्रतिनिधियों के माध्यम से राज कर रही हैं ! जो वह लोग चाहते हैं वही कानून इस देश में उनके हित में बनता है और हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि उस कानून को मनवाने के लिये उनके पास पुलिस का डंडा है जो हमारे ही टैक्स के पैसे से हमारे ही ऊपर चलने के लिये बना है ! अब हम मन चाहा टैक्स देने के बाद भी अपने ही देश में इन विदेशी कंपनियों के लुटेरों के गुलाम बन चुके हैं !

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