लूट ही संपन्नता का रहस्य है : Yogesh Mishra

प्रकृति ने समाज के हर व्यक्ति के लिए हर वस्तु सहज ही उपलब्ध करवाई है ! जिसे दूसरे शब्दों में कहा जाये कि प्रकृति के द्वारा उपलब्ध हर वस्तु पर हर व्यक्ति का समान अधिकार है !

किंतु समाज को चलाने वाले लोगों ने प्रकृति द्वारा सहज उपलब्ध करवाई गई वस्तुओं पर सामाजिक नियम बनाकर विशेष व्यक्तियों का एकाधिकार स्थापित कर दिया है ! यही सामाजिक लूट का आधार है !

विश्व के सभी संपन्न देश इसी सामाजिक मान्यता प्राप्त लूट की व्यवस्था के कारण ही आज संपन्न हैं ! आज भी उन देशों में राष्ट्रहित में लूट को सामाजिक और विधिक मान्यता प्राप्त है !

फिर चाहे वह लूट भगवा कपड़े में की जाए या खादी के सफेद कपड़ों में ! कोर्ट के काले कोट में की जाए या अस्पताल के सफेद कोर्ट में ! कॉर्पोरेट हाउस के टाई कोट में की जाए या फिर खाकी वर्दी में ! पर कानून से मान्यता प्राप्त यह लूट भी लूट ही रहेगी !

इसी वजह से संपन्न देश और संपन्न होते जा रहे हैं और सिद्धांतों पर चलने वाले गरीब देश और गरीब होते जा रहे हैं ! क्योंकि इन गरीब देशों के पास वैश्विक लूटपाट को रोकने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है !

क्योंकि संसार में उपलब्ध जब कोई वस्तु किसी व्यक्ति विशेष या राष्ट्र के बुद्धि चातुर्य या विधि व्यवस्था के कारण उसके अधीन हो जाती है तो दूसरा व्यक्ति या राष्ट्र आवश्यकता पड़ने पर भी उस वस्तु का प्रयोग नहीं कर पाता है ! जिससे समाज में सैकड़ों तरह की हिंसा पैदा होती है !

इस सैकड़ों तरह की हिंसा के मूल में किसी एक व्यक्ति या राष्ट्र का संपन्न होना ही है और कानून का डर दिखा कर हजारों व्यक्तियों का शोषण होना सुनिश्चित है ! इसीलिए सामाजिक असंतुलन पैदा होता है ! जिसके कारण समाज में लूटपाट की घटनाएं होती रहती हैं !

लेकिन अपनी आवश्यकता के लिये जिन्हें कानून में लुटेरा कहा जाता है ! ठीक उसी तरह अपनी संपन्नता के लिए भी व्यक्ति व्यक्ति कानून के दायरे में लूटपाट ही करता है ! क्योंकि संपन्न व्यक्ति की लूटपाट समाज और विधि में मान्यता प्राप्त होती है, इसलिए संपन्न व्यक्ति को लुटेरा नहीं कहा जाता है ! जबकि प्रकृति की व्यवस्था में वह भी लुटेरा है !
अभाव ग्रस्त गरीब व्यक्ति से संपन्न लुटेरे व्यक्ति को बचाने के लिये ही दुनिया के सभी कानून, पुलिस, अदालत, जेल खाने आदि बनाये गये हैं !

जब तक समाज में संपन्न व्यक्तियों के लूटपाट के सिद्धांतों को भी सामाजिक मान्यताओं और सामाजिक स्वीकृति से अलग कर के प्रकृति की व्यवस्था के तहत स्वीकृति नहीं दी जायेगी, तब तक समाज में कभी भी हिंसा समाप्त नहीं हो पायेगी !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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