घृणा का व्यवसायी कौन : Yogesh Mishra

इस महाआपदा के काल में हजारों लोग, जिनमें पत्रकार, बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, राजनेता, साधु-संत, मौलवी, उलेमा, पादरी, किसान, मजदूर, शिक्षक, नौकरशाह आदि सभी शामिल हैं ! अनेक प्रकार से संक्रमित मरीज, उनके परिवार तथा उनसे प्रभावित होने वाले लोगों की जो भी संभव है वह लोग सेवा-सहायता कर रहे हैं !

इनमें से ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर दिखावा नहीं करते ! हां सोशल मीडिया का सेवा-सहायता के लिए उपयोग जरुर करते हैं ! अगर आप उनको फोन करेंगे तो थोड़ी देर में ही पता चल जाएगा कि वाकई उनके पास दूसरे फोन आ रहे हैं !

इनमें भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जो बस सिर्फ सरकार की आलोचना कर रहे हैं और यह वाजिब भी है ! लेकिन वास्तविक सेवा-सहायता करने वाले अधिकतर एक ही व्यक्ति को महाखलनायक साबित करने की मानसिक व्याधि से पीड़ित नहीं हैं ! मनुष्यता और इंसानियत की एकमात्र कसौटी यही है कि संकट के समय ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, दुश्मनी, वैचारिक मतभेद आदि का परित्याग कर एकजुटता के साथ काम किया जाये ! देश के बड़े वर्ग ने ऐसा चरित्र पेश भी किया है !

लेकिन जिनको बहुत कुछ करना नहीं है और जिनका एक मात्र एजेंडा यही है कि किसी तरह नरेंद्र मोदी को बदनाम किया जाये ! उनके लिए इंसानियत या मनुष्यता की कसौटी के कोई मायने न पहले थे और न आज हैं न आगे कभी रहेंगे !

क्या इनके सोशल मीडिया से दुष्प्रचार को आम जनता मान लेगी कि कोरोना के दूसरे विस्फोट के लिए मुख्य दोषी मोदी ही हैं ? क्या लोगों की समझ में यह नहीं आएगा कि स्वास्थ्य मुख्यतः राज्यों का विषय है ? क्या लोगों के ध्यान में नहीं आएगा कि राज्यों में चलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं, जिनमें सरकारी और निजी अस्पताल दोनों शामिल हैं, वह सब कुछ राज्य सरकारों के नियंत्रण में है !

अगर यह समूह संतुलित रूप से केंद्रों के साथ राज्यों में सत्तारूढ़ संपूर्ण राजनीतिक प्रतिष्ठान की नाकामियों, उनके जनविरोधी कदमों को तथ्यों के साथ रखता है तो इनका असर जरुर होगा, लोग चिंतन भी करेंगे और शायद सुधार भी हो लेकिन ऐसा इन तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा नहीं किया गया !

कोरोना का वर्तमान विस्फोट कई सम्मिलित राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय कारकों के संहारकता की परिणति है ! इसमें प्रकृति, समय, कोरोना वायरस का बदलता चरित्र, हम सबका सामूहिक व्यवहार, कोराना नियंत्रण करने के पहले के कदमों की आर्थिक कीमत से उत्पन्न परेशानियों का दबाव, केंद्र एवं राज्य सरकारों की लापरवाहियां तथा अनुभवों के आधार पर भविष्य के पूर्वोपाय न करने करने की विफलता जैसे अनेकों कारक शामिल हैं !

जिस समय ऑक्सीजन का एक बड़ा संकट था ! क्या सम्पूर्ण राष्ट्र में कोरोना से सबसे ज्यादा आघात झेलने वाली राज्य सरकारें और उनके स्वास्थ्य महकमे को इसका अनुभव नहीं हुआ था ? आगे ऐसी परिस्थितियां दुबारा उत्पन्न नहीं हो इसके लिए क्या किया गया ? क्या ऑक्सीजन प्लांट विकसित हो गये ! जिन्हें राज्य सरकारों को करना था ! अगर ऐसा नहीं हुआ तो है तो इसके लिये वास्तविक जिम्मेदार कौन ! राज्य सरकारों की जिम्मेदारी क्यों नहीं है ?

महाराष्ट्र सरकार ने सबसे ज्यादा कोरोना का दंश झेलने के बावजूद ऑक्सीजन प्लांट लगाने-लगवाने में किंचित रुचि नहीं दिखाई ! क्या महाराष्ट्र में मचे हाहाकार के लिये मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सहित उनकी सरकार और उसमें शामिल राजनीतिक दलों, स्वास्थ्य महकमे व प्रशासन को खलनायक नहीं माना जाना चाहिये ? जो निजी अस्पताल ऑक्सीजन, ऑक्सीजन, ऑक्सीजन की रट लगाते हुए न्यायालयों का दरवाजा तो खटखटा रहे थे ! पर क्या उन्होंने अपने राज्य के नागरिकों के लिए ऑक्सीजन प्लांट लगाने की कोई कोशिश शुरू की ! आखिर जनता के जीवन मृत्यु पर अपनी राजनीति क्यों कर रहे हैं ? क्या यह सब भी खलनायक नहीं हैं !

आश्चर्य देखिए कि जिन दवा समूहों ने और अस्पतालों ने समाज को धोखा देकर लूटा, उनके विरुद्ध राज्य सरकारों की ओर से कोई भी कार्यवाही नहीं हुई ! बल्कि उनको उल्टा हीरो बना दिया गया और उन्हें पुरस्कार भी वितरित किये गये जबकि सब कुछ मानकों के विपरीत चल रहा था !

अस्पताल मूल रूप से इस आपातकाल में लूटपाट का केंद्र बन गए थे ! कोई निजी अस्पताल अपने आईसीयू के लिए जितने बिस्तर रखता है, उन सबके लिए सभी उपयुक्त संसाधन उसके पास होना चाहिये ! जिसमें ऑक्सीजन की व्यवस्था भी शामिल है ! अगर इन्होंने नहीं किया तो येह अपराधी हैं !

मेडिकल कैंसिल और राज्य सरकारों द्वारा इनके विरुद्ध कोई भी सदोष मानव वध की कार्यवाही आरंभ नहीं की गई ! न ही रासुका लगा और न ही गैंगस्टर एक्ट में इनके खिलाफ कोई कार्यवाही की गई ! ऐसा लगता है कि इन्हें प्रायोजित हत्या के उपरांत संरक्षण प्राप्त है ! जिस कारण यह लो पूरे आत्मविश्वास के साथ समाज को लूट रहे हैं !

अगर कोरोना फैलाव में चुनावी सभाओं और रैलियों की भी भूमिका है तो इसके लिए सभी पार्टियां समान रूप से दोषी हैं ! जिस-जिस ने इस विपत्ति काल में चुनावी रैलियां आयोजित की थी ! वह सभी समान रूप से अपराधी हैं ! साथ ही चुनाव आयोग और न्यायपालिका भी अपराधी है जिसने ऐसा होने दिया ! यदि भाजपा की चर्चा की जाएगी तो उन लोगों की भी चर्चा होनी चाहिए जिन्होंने चुनावी रैलियों के माध्यम से क रोना के संक्रमण को बढ़ाया था !

कहने का तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति विशेष या किसी व्यक्ति के राजनीतिक दल को दोषी ठहरा देने से समाज की व्यवस्था ठीक नहीं होगी ! बल्कि यदि समाज को ठीक तरीके से चलाना है तो समाज के प्रत्येक अंग की तटस्थ और स्पष्ट समीक्षा की जानी चाहिए ! न कि किसी व्यक्ति विशेष की या किसी राजनीतिक दल विशेष की ! जब हम किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल विशेष को हर बात के लिए दोषी मानने लगते हैं तो यह हमारे मानसिक रूप से परिपक्व होने का स्पष्ट संकेत होता है !

इसलिए हमें अपने राष्ट्र के हित को सर्वोपरि रखते हुए समग्र समाज के लिए चिंतनशील होना चाहिए और सामाजिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को उंगली उठाकर इंगित करना चाहिए ! न कि समाज का शोषण करने वालों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये !

सारी जिम्मेदारी का ठीकरा किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल पर डालकर सामाजिक कर्तव्यों से मुक्त हो जाया जाये जो दोषी है उसके विरुद्ध स्पष्ट और सटीक प्रमाण के साथ आरोप लगाए जाने चाहिए ! जिससे सामाजिक व्यवस्था में सुधार हो और हम और हमारा राष्ट्र सुरक्षित रहे ! यह हमारी कामना ही नहीं बल्कि आवश्यकता भी है ! न तो कोई व्यक्ति विशेष और न ही कोई राजनीतिक दल बल्कि हम सभी घृणा के व्यवसाई कहलाएंगे !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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