भगवान कृष्ण से जुड़े किसी भी मूल ग्रंथ में नहीं मिलता ‘राधा’ का वर्णन ,महत्वपूर्ण लेख जरूर पढ़ें ।

श्रीमद्भा भागवत पुराण में श्रीकृष्ण की बहुत सी लीलाओं का वर्णन है, पर “राधा” का वर्णन कहीं नहीं है। “राधा” का वर्णन मुख्य रूप से “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में आया है। जो श्रीकृष्ण के समकालीन वेद व्यास द्वारा लिखित नहीं है | “ब्रह्मवैवर्त पुराण” ब्रह्मखंड के पाँचवें अध्याय में श्लोक 25,26 के अनुसार “राधा” को श्रीकृष्ण की “पुत्री” सिद्ध किया गया है क्योंकि वह श्रीश्रीकृष्ण के वामपार्श्व से उत्पन्न हुई थी ।

“ब्रह्मवैवर्त पुराण” प्रकृति खण्ड अध्याय 48 के अनुसार “राधा” श्रीकृष्ण की विवाहिता पत्नी थी, जिनका विवाह ब्रह्मा जी ने करवाया था । अब सवाल यह उठता है कि जब 11 वर्ष की अवस्था में श्रीकृष्ण मथुरा व्रंदावन छोड़ कर चले गए थे, तो इतनी लघु अवस्था में “राधा” के साथ प्रेम या विवाह की कल्पना कैसे की जा सकती है ?

इसी पुराण के प्रकृति खण्ड अध्याय 49 श्लोक 35,36,37,40, 47 के अनुसार “राधा” श्रीकृष्ण की “मामी” थी क्योंकि उसका विवाह श्रीकृष्ण की माता यशोदा के भाई रायण के साथ हुआ था। गोलोक में रायण श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। अतः गोलोक के रिश्ते से “राधा” श्रीकृष्ण की “पुत्रवधु” हुई।

ऋषि दयानन्द सरस्वती तथा महान शोध लेखक बंकिम चन्द्र चर्टजी ने श्रीकृष्ण को सर्वगुण सम्पन्न और सर्वपाप रहित आदर्श चरित्र के रूप में लिखा है ये कहते हैं कि “ब्रह्मवैवर्त पुराण” लेखक महाभारत के श्रीकृष्ण तक पहुँच ही नहीं पाए। जो पराई स्त्री से तो दूर, अपनी स्त्री से भी बारह साल की तपस्या के बाद केवल संतान प्राप्ति हेतु समागम करता है, जिसके हाथ में मुरली के साथ ही दुष्टों का विनाश करने के लिए सुदर्शन चक्र भी था, जिसे गीता में “योगेश्वर” कहा गया है। जो आधा पहर रात्रि शेष रहने पर उठकर ईश्वर की उपासना करते थे तथा इष्ट गायत्री का जप करते थे | युद्ध और यात्रा में भी जो निश्चित रूप से त्रिकाल संध्या करते थे । जिसके गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आदर्श पुरुषों के सदृश थे, जो धर्म और सत्य की रक्षा के लिए सामाजिक मान्यताओं की परिभाषा भी बदल देते थे । महाभारत काल में भी परस्त्री से अवैध संबंध रखना दुराचार माना जाता था। यदि श्रीकृष्ण का भी “राधा” नामक किसी औरत से संबंध हुआ होता तो श्रीकृष्ण का विरोध करने वाले शिशुपाल, शकुनी, कंस, कालयवन जैसे लोग पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर भी अंगुली उठाते ?

वस्तुतः “राधा” का वर्णन “ब्रह्मवैवर्त पुराण” तथा “कवि जयदेव” ही करते हैं। शेष महाभारत, हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भा भागवत पुराण में “राधा” का कोई भी उल्लेख नहीं है। अब यदि राधा तत्कालीन समय में इतनी ही महत्वपूर्ण चरित्र होती तो क्या वेदव्यास जैसे श्रीकृष्ण के समकालीन महर्षि उनको उल्लिखित करना भूल जाते ? बाद के भी महत्वपूर्ण रचनाकारों मीराबाई, सूरदास, तुकाराम आदि संतों ने भी “राधा” का नाम उल्लेख करना उचित क्यों नहीं समझा ? श्रीकृष्ण के हजारों प्राचीन मंदिरों में भी “पुरी” में “बहन सुभद्रा” “द्वारिका” में “पत्नी रुकमणि” का विग्रह मिलता है पर राधा का विग्रह 1250 ईस्वी के बाद के मंदिरों में ही मिलता है जैसे अब साईं बाबा को भगवान बना कर मंदिरों में बैठा दिया गया | इससे यह सिद्ध होता है कि महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण की “राधा” नाम की कोई “प्रेयसी” नहीं थी। अब यदि महाभारत, हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण तथा श्रीमद्भा भागवत पुराण में “राधा” नाम का उल्लेख नहीं हैं तो फिर इस विशिष्ट चरित्र का उद्भव कैसे हुआ? आइए हम इस तथ्य को जानने का प्रयत्न करते हैं :-

राधा-श्रीकृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ-संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। निम्बार्क, बल्लभ, राधावल्लभ, स्वामी हरिदास का सखी संप्रदाय राधा-कृष्ण की भक्ति के पाचवें स्तंभ बनकर खड़े हैं। निम्बार्क का जन्म 1250 ईस्वी में हुआ। इसका मतलब श्रीकृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई।
ब्रह्मवैवर्त पुराण को मुगलों व अंग्रेजों के इशारे पर विकृत कर संत शिरोमणि रविदास तथा कवि जयदेव आदि संतों ने वैष्णव धर्म की प्रेममार्गी शाखा “सखी संप्रदाय” को आगे बढ़ाया और रास लीला का चलन शुरू किया |

इसी प्रेममार्गी शाखा के आधार पर इस्कॉन के संस्थापक “श्री प्रभुपाद जी महाराज” ने तो श्रीकृष्ण-राधा के काल्पनिक संबंध को अपनी धर्म की दुकान चलाने के लिए वैदिक सभ्यता के साथ ही जोड़ दिया। बाद को इसी परम्परा को क्रपालु जी महाराज ने आगे बढ़ाया | आज तथा कथित भागवत कथा वाचक धन कमाने के लिये इस परम्परा को जीवित बनाये हुये हैं |

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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