महर्षि दयानन्द के गृहस्थों को पशु तुल्य निर्देश : ( आर्य समाजी हलाला ) Yogesh Mishra

महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास.-4 के पृष्ठ- 96,97 पर लिखा है कि वेदाध्ययन के समाप्त होने पर ही व्यक्ति को गृहस्थ में प्रवेश करना चाहिये !

सोलह से चौबीस वर्ष तक कन्या और पच्चीस से अड़तालीस वर्ष तक पुरुष का विवाह उत्तम है ! विवाह की उत्तम आयु तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये !

किन्तु यदि विवाह उपरांत स्त्री विधवा हो जाये तो विधवा स्त्री का पुनः विवाह इसलिये नहीं करना चाहिये क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जायेगा !

इसलिये संतान प्राप्ति के लिये नियोग करें ! इसके लिये वह किसी अन्य पुरूष से गर्भ धारण करवा ले ! वह सन्तान स्त्री के विवाहित पति की ही मानी जायेगी ! उसी का गोत्र भी मृत पति का ही होगा ! वीर्य दाता का नहीं !

गर्भ धारण (करने के) पश्चात् उस स्त्री व गैर पुरूष का कोई नाता न रहेगा ! बच्चों की परवरिश भी अकेली स्त्री स्वयं करें ! वीर्य दाता बच्चों के पालन में कोई सहयोग न करे ! दोनों अलग-अलग अपने- अपने घर में रहें !

सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास.-4 के पेज 101 पर लिखा है

महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे, अगर न रहा जाये ?
तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे !

फिर सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास.-4 के पृष्ठ-102 पर ही लिखा है

यदि किसी का पति मारता-पीटता हो तो उस स्त्री को चाहिये कि वह किसी अन्य पुरूष के पास जाकर गर्भ धारण कर ले तथा सन्तान उत्पति कर ले !

वह गैर सन्तान भी विवाहित जीवित पति की मानी जायेगी ! उसकी सम्पत्ति की भागीदार मानी जायेगी !

यदि किसी का पति धन कमाने विदेश गया हो और तीन वर्ष घर न आये ! तो वह स्त्री किसी गैर पुरूष से गर्भधारण करके सन्तान उत्पति करले ! वह सन्तान उसके जीवित विवाहित पति की ही मानी जायेगी !

सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-4 पृष्ठ-82 पर लिखा है

नवजात बच्चे को माता केवल छः दिन दूध पिलाये फिर अपने स्तनों से दूध पिलाना बन्द करने के लिए कोई पदार्थ लगाए !
बच्चे को दूध पिलाने के लिये ऐसी दाई रखो जिसके स्तनों में दूध हो वह उस नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाये !

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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