आखिर कहां थी रावण की लंका : Yogesh Mishra

अधूरे तथ्यों और ज्ञान के आभाव में आज भी वास्तविक लंका की खोज जारी है ! जिस पर कुछ शोध कर्ताओं का मैने संकलन किया है ! और अंत में अपना निष्कर्ष निकला है !

इस बारे में खोजकर्ता अपने-अपने मत रखते हैं जिनमें वह उन ऐतिहासिक तथ्‍यों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि रामायण में बताए गये हैं या कि देशभर में बिखरे हुए हैं ! एक शोधकर्ता लंका की स्थिति को आंध्रप्रदेश में गोदावरी के मुहाने पर बताते हैं तो दूसरे उसे मध्यप्रदेश के अमरकंटक के पास ! हालांकि इनका सराहनीय शोधकार्य आने वाले शोधार्थियों को प्रेरणा दे सकता है ! जरूरी है कि भारतीय इतिहास पर समय-समय पर शोधकार्य होते रहे और हम किसी एक निर्णय पर निष्पक्ष रूप में पहुंचे !

अमरकंटक में थी लंका : लंका की स्थिति अमरकंटक में बताने वाले विद्वान हैं इंदौर निवासी सरदार एमबी किबे ! इन्होंने सन् 1914 में ‘इंडियन रिव्यू’ में रावण की लंका पर शोधपूर्ण निबंध में प्रतिपादित किया था कि रावण की लंका बिलासपुर जिले में पेंड्रा जमींदार की पहाड़ी में स्थित है ! बाद में उन्होंने अपने इस दावह में संशोधन किया और कहा कि लंका पेंड्रा में नहीं, अमरकंटक में थी !

इस दावह को लेकर उन्होंने सन् 1919 में पुणे में प्रथम ऑल इंडियन ओरियंटल कांग्रेस के समक्ष एक लेख पढ़ा ! जिसमें उन्होंने बताया कि लंका विंध्य पर्वतमाला के दुरूह शिखर में शहडोल जिले में अमरकंटक के पास थी ! किबे ने अपना ये लेख ऑक्सफोर्ड विश्‍वविद्यालय में संपन्न इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ओरियंटलिस्ट्स के 17वें अधिवहशन और प्राच्यविदों की रोम-सभा में भी पढ़ा था ! हालांकि उनके दावह में कितनी सचाई है यह तो कोई शोधार्थी ही बता सकता है !

किबे के दावह को दो लोगों ने स्वीकार किया ! पहले हरमन जैकोबी और दूसरे गौतम कौल ! पुलिस अधिकारी गौतम कौल पहले रावण की लंका को बस्तर जिले में जगदलपुर से 139 किलोमीटर पूर्व में स्थित मानते थे ! कौल सतना को सुतीक्ष्ण का आश्रम बताते हैं और केंजुआ पहाड़ी को क्रौंचवन, लेकिन बाद में उन्होंने रावण की लंका की स्थिति को अमरकंटक की पहाड़ी स्वीकार किया ! इसी तरह हरमन जैकोबी ने पहले लंका को असम में माना, पर बाद में किबे की अमरकंटक विषयक धारणा को उन्होंने स्वीकार कर लिया ! इसी तरह रायबहादुर हीरालाल और हंसमुख सांकलिया ने लंका को जबलपुर के समीप माना, पर रायबहादुर भी बाद में किबे की धारणा के पक्ष में हो गये जबकि सांकलियाजी हीरालाल शुक्ल के पक्ष में हो गये !

अन्य विद्वानों का मत : सन् 1921 में एनएस अधिकारी ने इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप को लंका सिद्ध करने के 20 साल बाद सीएम मेहता ने कहा कि श्री हनुमान ने विमान से समुद्र पार किया था और लंका की खोज ऑस्ट्रेलिया में करनी चाहिए ! सन् 1904 में अयप्पा शास्त्री राशि वडेकर ने मत व्यक्त किया कि लंका सम्प्रति उज्जयिनी के समानांतर समुद्र तट से 800 मील दूर कहीं समुद्र में जलमग्न है !

लंका की स्थिति भूमध्य रेखा पर मानने के कारण वाडेर ने आधुनिक मालदीव या मलय को लंका माना जबकि टी. परमाशिव अय्यर ने सिंगापुर से लेकर इन्द्रगिरि रिवहरियन सुमात्रा तक व्याप्त भूमध्यरेखीय सिंगापुर को लंका घोषित किया ! 14वीं सदी में ज्योतिर्विद भास्कराचार्य ने लंका को उज्जयिनी की ही अक्षांश रेखा पर भूमध्य रेखा में स्थित माना था ! एक विद्वान विष्णु पंत करंदीकर ने लंका को इंदौर जिले में महेश्वर के पास नर्मदा तट पर स्थित माना है !

एक अन्य विचार के अनुसार गोदावरी के डेल्टा पर थी रावण की लंका ! मिथकों में इतिहास की खोज करने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर हीरालाल शुक्ल के अनुसार रावण की लंका गोदावरी के डेल्टा अर्थात जहां गोदावरी समुद्र में मिल जाती है, वहां पर स्थित थी ! बंगाल की खाड़ी में आंध्रप्रदेश का दौलेश्वरम् वह स्थान है, जहां गोदावरी 7 भागों में विभाजित होकर समुद्र में मिल जाती है वहीं पर एक द्वीप बनता है जिसे हीरालाल लंका कहते हैं !

शुक्ल के अनुसार श्रीलंका रावण की लंका नहीं है ! लंका अलग है, सीलोन अलग ! लंका और श्रीलंका अलग है ! आज का सिंहल द्वीप ही श्रीलंका है जिसे लंका नहीं कहा जा सकता ! रावण सिंहल या श्रीलंका का नहीं, लंका का राजा था और यह लंका गोदावरी नदी के मुहाने पर थी ! शुक्ल के अनुसार विभिन्न पुराणों में लंका और सिंहल का पृथक उल्लेख मिलता है ! दशरथ के काल में सिंहल का राजा चन्द्रसेना था, रावण नहीं ! वाल्मीकि रामायण 4.41 के अनुसार रावण के कथानुसार लंका प्रवहश के लिए ताम्रपर्णी नदी को पारकर महेन्द्रगिरि के दक्षिण में चलना पड़ता था ! सीलोन को अगर लंका मानें, तो वहां पहुंचने के लिए ताम्रपर्णी नदी नहीं पार करना पड़ती है !

डॉ. कुबेरनाथ राय, हंसमुख धीरजलाल सांकलिया, डॉ. लाल सभी ने उनकी इस बात का समर्थन किया ! डॉ. पार्टीजर भी यह मानते हैं कि सीलोन रामायणकालीन नहीं है ! हीरालाल कहते हैं कि यह भ्रम तुलसीदास के काल में फैला कि आज का सिंहल या सीलोन ही रावण की लंका है ! सवाल यह उठता है कि तुलसीदास ने रामायण और रामायण से संबंधित अन्य कई रामायण पढ़कर ही रामचरित मानस लिखी थी ! वह भी तो खोजकर्ता और शोधार्थी थे ! रामचरित मानस लिखना हर किसी के बस की बात तो नहीं !

हीरालाल के अनुसार यह मान्यता अति प्रबल है कि रामेश्वरम से अतिदूर सीलोन या श्रीलंका ही रावण की लंका है लेकिन रावण की लंका गोदावरी के डेल्टा में थी जिसे ग्रंथों में त्रिकूट कहा गया है ! गोदावरी के मुहाने पर जहां नदी गोमती और वसिष्ठी दो भागों में विभाजित हो जाती है वहीं पर समुद्र में इनके विलय से जो द्वीप बना है उसे आज भी लंका कहते हैं ! इसे ही त्रिकूट कहा जाता है ! हीरालाल गोदावरी तट पर स्थित नासिक की पंचवटी को रामायणकालीन नहीं मानते हैं ! वह इस तथ्‍य को नकारते हैं कि जहां लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी उसी के कारण इस स्थान का नाम नासिक पड़ा !

हीरालाल से पहले सर्वप्रथम सन् 1876 में डॉ. केन ने संकेत दिया था कि भद्राचलम (खम्मण) के टेकापल्ली तालुका के रेकापल्ली गांव के वासी मानते हैं कि रावण समीपवर्ती एक भूखंड में निवास करता था ! बाद में सुरवरि प्रताप रेड्डी ने तेलुगु ग्रंथ ‘रामायण विशेषमुलु’ (हैदराबाद 1930) में मत व्यक्त किया कि लंका कृष्णा और गोदावरी के मध्य कहीं स्थित थी और हनुमान ने संभवत: गोदावरी की किसी शाखा को पार किया था ! सन् 1932 में पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने महाकोशल हिस्टोरिकल रिसर्च सोसायटी के शोधपत्र (बिलासपुर 1932, खंड 1 पृष्ठ 20) में संक्षिप्त उल्लेख किया था कि आंध्रप्रदेश के इस क्षेत्र में लंका मानना चाहिए, जो समुद्र तट से संलग्न है !

खंडन : यदि हम डॉ. हीरालाल शुक्ल की बातों को मानते हैं तो लंका ही नहीं, प्रत्येक वह स्थान बदलना होगा, जो रामायणकाल से जुड़ा है ! मसलन कि फिर समुद्र, धनुषकोडी, रामसेतु और किष्किंधा कहां थे? फिर राम के रामेश्वरम् जाकर शिवलिंग की स्थापना करने का क्या औचित्य? रामेश्वरम् के पास कोडीकरई वह स्थान था, जहां हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े थे ! महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी ! तो क्या यह मानें कि दौलेश्वरम् से 1,000 किलोमीटर दूर श्रीराम ने पहले रामेश्वरम् में पूजा-अर्चना की फिर लंका पर चढ़ाई की !

बंगाल की खाड़ी में दौलेश्वरम् वह स्थान है, जहां गोदावरी 7 भागों में विभाजित होकर समुद्र में मिल जाती है वहीं पर एक द्वीप बनता है जिसे हीरालाल लंका कहते हैं ! दौलेश्वरम् आंध्रप्रदेश के राजमुंदरी जिले में आता है ! दौलेश्वरम् से रामेश्वरम की दूरी करीब-करीब 1,000 किलोमीटर है ! अब सवाल यह उठता है कि श्रीराम क्यों पहले उल्टे रामेश्वरम् गये फिर दौलेश्वरम आए, वह भी 1,000 किलोमीटर दूर जबकि उनके पास संकटकाल में इतना समय नहीं था कि वहां जाएं !

हीरालाल शुक्ल माल्यवान पर्वत को रत्नागिरि (महाराष्ट्र), अनागुंदू (मैसूर) या रायचूर में न मानकर बस्तर में तुलसी डोंगरी में मानते हैं ! माल्यवान पर्वत पर ही राम ने सीता के विरह में कुछ दिन बिताए थे ! शुक्लजी इसी तरह क्रोंचगिरि को शबरी नदी से थोड़ी दूर कोरापुर में स्थित मानते हैं और ऋष्यमूक जहां सुग्रीव ने बाली के भय से अपना निवास स्थान बनाया था, को गोदावरी तट पर उत्तर में स्थित किष्किंधा में मानते हैं !

जबकि हमारे मतानुसार ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था ! यह किष्किंधा कर्नाटक में स्थित है ! इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी ! बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई ! जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था ! यह ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है !

एमबी किबे और उनके अनुयायियों ने रीवा संभाग में कंधों ग्राम को प्राचीन किष्किंधा मानने से इंकार किया है ! वह कहते हैं कि गोदावरी और पंपालेख के संगम से थोड़ी दूर पापीकोंडा (पंपा पर्वत) की उपत्यका में स्थित आधुनिक किक्किडा ही किष्किंधा है ! दरअसल, यह आंध्रप्रदेश का आधुनिक काकीनाडु है, जो गोदावरी के डेल्टा के पास स्थित है ! बाली किष्किंधावासी था लेकिन उसकी वानरसेना दंडकारण्य तक छाई हुई थी !

हीरालाल मानते हैं कि वाल्मीकि गोदावरी के दक्षिण में स्थित प्रदेशों से अपरिचित थे ! हीरालाल यह भी कह चुके हैं कि लंका के बारे में भ्रम तुलसीदास के काल में फैला ! इसका मतलब यह कि उनकी नजरों में ये दोनों विद्वान अल्पज्ञ थे ! हीरालाल के मतानुसार आंध्र में खम्मण जिले में भद्राचलम से 44 मील दक्षिण पूर्व में स्थित रामगिरि की रघुवंश में वर्णित रामगिरि है ! वर्तमान का अबूझमाड़ राकसमेटा पर्वत है ! भद्राचलम से 3 मील दूर एटपक (जटपक) में जटायु का आवास था और दुम्मगुड़ेम में उसने रावण से संघर्ष किया था ! यह संघर्ष इतना विकराल था कि धूल के बादल उड़े और गांव का नाम ही दुम्मे (धूल) गुड़ेम (गांव) पड़ गया ! वह यह भी कहते हैं कि रावण के रथ के आघात के कारण समीपवर्ती पहाड़ी का नाम रादपु (रथ) गुट्टा (पहाड़ी) पड़ा !

वर्तमान में खम्मण और पूर्वी गोदावरी की सहायक नदी पंपालेरू ही रामायण की पंपा नदी है ! शुक्ल के अनुसार शबरी नदी दंडकारण्य में मिलती है ! पंपा भी गोदावरी में विलीन होती है ! आगे गोदावरी पापी पहाड़ियों में बहती है, जहां उसकी गहराई 200 फुट तक है ! पापी (पंपा) कुंड की रचना कर वह पोलावरम के समीप मैदानी क्षेत्र में प्रकट होती है ! महेन्द्र पर्वत के समीप राजहेंद्र में उसका पाट 2 मील और दोवलेश्वर के पास 4 मील चौड़ा हो जाता है ! यहां गोदावरी मुख्यत: 2 शाखाओं में विभक्त और समुद्र से घिरा हुआ गोदावरी का डेल्टा ही रावण की लंका है ! ऐसा लगता है कि गोदावरी के पास ही नल के मार्गदर्शन में सेतुबंध बना था लेकिन वह सेतु कहां है? डॉ. शुक्ल के अनुसार वैद्यराज सुषेण के कहने से सुदूर उत्तर में हिमालय में गंधमादन से जड़ी-बूटी उठा लाए थे ! वह समीपवर्ती गंधमादन (पूर्व परिमलगिरि) जो उड़ीसा में संबलपुर और बलां‍गीर की सीमा बनाता है, से लक्ष्मण के मूर्छित होने के बाद औषध ले गये थे !

अब यदि शुक्ल के इस मत को मानें तो फिर केरल की पंपा नदी को भुलना होगा ! वहां पंपा सरोवर को भी भुलना होगा ! वहां के सभी तीर्थों को भी भूलना होगा ! विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है ! यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है ! श्रीराम पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गये, जो आजकल केरल में स्थित है ! तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है ! पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है ! पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है ! पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है ! इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था ! केरल से आगे जाकर श्रीराम ने रामेश्वरम में पूजा-अर्चना की और बाद में वहीं कुछ और आगे जाकर रामसेतु बनवाया जिसके अवशेष आज भी मौजूद हैं !

दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गये ! मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था ! उस काल में पंचवटी जनस्थान के अंतर्गत आता था ! मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था ! गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी ! वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है !

वाल्मीकि रामायण पर आधारित वर्तमान शोधानुसार रामेश्वरम् के पास कोडीकरई में हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े ! मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया ! श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया था ! तमिलनाडु की एक लंबी तट रेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है ! कोडीकरई समुद्र तट वहलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है ! लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम् की ओर कूच किया ! रामेश्‍वरम् समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है !

सुकेश के 3 पुत्र थे- माली, सुमाली और माल्यवान ! माली, सुमाली और माल्यवान नामक 3 दैत्यों द्वारा त्रिकुट सुबेल (सुमेरु) पर्वत पर बसाई गई थी लंकापुरी ! माली को मारकर देवों और यक्षों ने कुबेर को लंकापति बना दिया था ! रावण की माता कैकसी सुमाली की पुत्री थी ! अपने नाना के उकसाने पर रावण ने अपनी सौतेली माता इलविल्ला के पुत्र कुबेर से युद्ध की ठानी थी और लंका को फिर से राक्षसों के अधीन लेने की सोची !

रावण ने सुंबा और बाली द्वीप को जीतकर अपने शासन का विस्तार करते हुए अंगद्वीप, मलय द्वीप, वराह द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप, यव द्वीप और आंध्रालय पर विजय प्राप्त की थी ! इसके बाद रावण ने लंका को अपना लक्ष्य बनाया ! लंका पर कुबेर का राज्य था, परंतु पिता ने लंका के लिए रावण को दिलासा दी तथा कुबेर को कैलाश पर्वत के आसपास के त्रिविष्टप (तिब्बत) क्षेत्र में रहने के लिए कह दिया ! इसी तारतम्य में रावण ने कुबेर का पुष्पक विमान भी छीन लिया !

आज के युग के अनुसार रावण का राज्य विस्तार, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, दक्षिण भारत के कुछ राज्य और संपूर्ण श्रीलंका पर रावण का राज था ! श्रीलंका की श्रीरामायण रिसर्च कमेटी के अनुसार रामायण काल से जुड़ी लंका वास्तव में श्रीलंका ही है ! कमेटी के अनुसार श्रीलंका में रामायण काल से जुड़ी 50 जगहों पर रिसर्च की गई है और इसकी ऐतिहासिकता सिद्ध की है !

इसी तरह डॉ. शुक्ल ने लंका का वर्णन इन शब्दों में किया है कि गोदावरी जब समुद्र में विलीन होती है तो मुख्‍यत: 2 शाखाओं में विभाजित हो जाती है ! गोदावरी की एक शाखा गौमती और दूसरी वसिष्ठी कहलाती है ! गौमती गोदावरी पूर्वान्मुख होकर रामचन्द्रपुरम और काकिनाडु की दक्षिण सीमा में प्रभावित होकर उन्हें राजोल और ममलापुरम से पृथक कर अनेक धाराओं में वि‍भक्त होकर समुद्र में प्रवहश करती है तो वसिष्ठी गोदावरी दक्षिणोन्मुखी हो राजोल की पश्चिमी सीमा बनाती हुई नरसापुर के पास समुद्र में समाहित हो जाती है ! जिला मुख्‍यालय काकिनाडु से 40 मीर दूर राजोल तालुका चारों और से जल प्रवास से घिरा है ! पूर्व में बंगाल खाड़ी उत्तर में गौमती और दक्षिण में वासिष्ठी से घिरे इस त्रिकूट को ही क्षेत्रीय जनता लंका मानती हैं !

डॉ. शुक्ल के अनुसार गोदावरी के त्रिकूट में 101 उपद्वीप या लंकाएं हैं ! कुछ लंकाओं के नाम इस प्रकार हैं- लंका, बीसन लंका, पिलंका, कोयलंका, मूर लंका, गोदि लंका, वक्क लंका, वोद्दवरि लंका, चिंता लंका, येदुरलंका, बेलम लंका, पसरपुड़ि लंका, वंतेलंका, वहसिसुअरि लंका, मडिमवल्ल लंका आदि ! राक्षसराज इन सभी 101 लंका का स्वामी था और लकड़ी, ईंट, पत्थर आदि से बने दुर्ग उसके राज्य को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करते थे !

यदि यहां की लंकाओं का व्यापक सर्वेक्षण और उत्खनन किया जाए तो प्राचीन लंका की स्थिति का ज्ञान हो सकता है ! माना जाता है कि राजोल तालक में वैनतेमय नदी के पार्श्‍व में स्थित लंका ही मूल लंका थी ! इसके दक्षिण में बादिलंका और एक ओर अकलापुरम 6 मील दूर है ! यहां वडपल्ले, काडलि, पालिवहला आदि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के गांव हैं ! यहां के एक गांव का नाम लक्ष्मणेश्वर है, जहां राम और लक्ष्मण के बहुत ही प्राचीन मंदिर हैं ! इसके अलावा प्रत्येक उपद्वीपीय ग्राम में आज भी रामालयम, आंजनेयालयम, अगत्स्येश्वशलम और अम्मालयम है ! द्राक्षाराम और राजुल के देवालय अत्यंत प्राचीन हैं !

इस तरह यह सिद्ध होता है कि रावण की लंका रावण साम्राज्य में एक मात्र नगर था ! जो रावण के साम्राज्य की राजधानी थी ! रावण का संपूर्ण साम्राज्य उत्तर ने वर्तमान श्रीलंका से शुरू होकर त्रिभुजाकार पूर्व में ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम में अफ्रीका तक “कुमारी कंडम” के नाम से विस्तारित आठवां महाद्वीप था !

जोकि राम रावण के महाविनाशकारी युद्ध के कारण 49 हिस्सों में टूट कर हिंद महासागर में समा गया ! जिस महाविनाशकारी घटना का वर्णन किसी भी वैष्णव संस्कृत साहित्य में नहीं मिलता है ! किन्तु तमिल लोक गीतों में आज भी इसका वर्णन मिलता है !

इसीलिये रावण की वर्तमान लंका को ही दुर्भाग्यवश रावण का साम्राज्य मान लिया जाता है और सभी भ्रम की स्थिति यहीं से पैदा होती है ! जबकि कर्क रेखा से नीचे मकर रेखा तक पृथ्वी पर जो जो भूभाग आते थे ! वह सभी रावण के साम्राज्य का हिस्सा थे ! इसमें अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कुमारी कंडम आदि सभी क्षेत्र रावण के आधीन थे !

इसीलिये इन सभी क्षेत्रों में रावण कालीन अवशेष और चिन्ह प्राप्त होते हैं ! किंतु फिर भी रावण के साम्राज्य की राजधानी वर्तमान का श्रीलंका द्वीप ही था ! इसमें कोई संदेह नहीं है !!

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योगेश कुमार मिश्र 

ज्योतिषरत्न,इतिहासकार,संवैधानिक शोधकर्ता

एंव अधिवक्ता ( हाईकोर्ट)

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